

जन कवि - नाज़िम हिक़मत
नाज़िम हिक़मत ने विश्वास से भरा जीवन जिया। उन्हें विश्वास था साम्यवाद के आदर्शों में, उनकी कविता, उनका साहित्य साक्ष्य थे उनके विश्वास का। परंतु अनेक मानने वालों की अपेक्षा वो अपने देश के लोगों से भी बहुत गहरे जुड़े हुए थे। उनकी इस पुस्तक का जन्म भी सन् 1938 से 1950 तक बिताए उनके तेरह वर्षों के कारावास के दौरान हुआ। पुस्तक, कुछ वर्षों पश्चात, हिस्सों में प्रकाशित हुयी, सर्वप्रथम इटली और फिर तत्कालीन सोवियत संघ में।
हिक़मत, हर दृष्टि से तुर्की के बीसवीं सदी के सबसे प्रख्यात कवि और लेखक, ने अपनी लेखनी से अपने देश की एक महकाव्यात्मक छवि को आकार दिया है। एक कुलीन तुर्की परिवार में जन्मे, इस्तांबुल में एक बुद्धिजीवी के रूप में बड़े हुए, हिक़मत ने असल में स्वयं को पुनः आविष्कार किया अपने कारावास के दिनों में जब उन्हें पता चला अपने देश के आम आदमियों और औरतों के बारे में, उनके दुखों, उनके दैनंदिन जीवन- उसका सौन्दर्य और उसकी गंभीरता, पवित्रता, के बारे में।
अपने बुद्धिजीवी वाले साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी लेखक टॉलस्टाय की महान मकाव्यात्मक उपन्यास 'युद्ध और शांति' का अनुवाद किया। हिक़मत एक समाजवादी थे और एक अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे, बीसवीं सदी के मध्य दशकों में मार्क्सवाद और सोवियत संघ से उत्प्रेरित दुनिया से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए। यह उनका अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी दृष्टिकोण ही है जो इस पाँच सौ पन्नों से भी अधिक लंबी इस महाकाव्य की रचना को प्रभावित करती है, जिसमें उन्होने अपने प्यारे तुर्की के आम इंसानी ज़िंदगियों को इतनी गभीरता से दर्शाया है, इतिहास से ओत-प्रोत उनकी प्यारी भूमि। यह महाकाव्य न केवल एक यात्रा है गुजरती हुयी तुर्की के लोगों के बीच से अपितु यह उनकी बौद्धिक और यहाँ तक कि आध्यात्मिक यात्रा भी है अपने जन्मभूमि की। ऐसा महाकाव्य जहाँ एक जन-कवि की कलम से लोगों को वाणी मिलती है।
नाज़िम हिक़मत, फ्रेडेरिकों गार्सिया लोर्का, पाब्लो नेरुदा, गुंटर ग्रास, जेम्स जॉय्स और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे महान लेखकों की श्रेणी में हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि 'संपर्क' को इस महान तुर्की लेखक को प्रकाशित करने का गौरव प्राप्त हुआ है। इस महाकाव्य का मूल तुर्की शीर्षक 'मेम्लेकित्म्देन इंसान मंज़रालारी' है। 'इंसान', अर्थात मानव/मनुष्य, भारत कि दो महान भाषाएँ- हिन्दी और उर्दू, में प्रयोग किए जाने वाले आम शब्द हैं। तुर्की और भारत एक साथ जुड़े हुए भी रहे हैं अपने मध्ययुगीन अतीत में। तुर्की का प्रभाव भारत की भाषाओं में जीवंत है। तुर्की हवाई कंपनी का नाम 'तुर्क हवाई योल्लारी' है, और 'हवा' शब्द, अर्थात वायु, हूबहू बंगला और हिन्दी माषाओं में मी उसी अर्थ के साथ प्रयोग किए जाते हैं। हिक़मत के इस महाकाव्य का हिन्दी में प्रकाशन से, और शीघ्र ही बंगला माषा में मी, भारत में एक नए साहित्यिक सौरम का प्रवाह होगा और समुद्रों को पार करती ये हवाएँ फिर से तुर्की और मारत की महान सम्यताओं को जोड़ देंगी।
नाज़िम हिक़मत
Author
आशीष दत्ता
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